ABOUT YOGI OAMSHRI ACHRAYASHIV
ABOUT YOGI OAMSHRI ACHARYASHIV
आचार्य शिव की जीवनयात्रा केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि उस साधक की यात्रा है जिसने अपने जीवन को योग, सेवा, करुणा और मानवता के लिए समर्पित कर दिया। उनका जीवन यह प्रमाणित करता है कि यदि किसी व्यक्ति के भीतर स्पष्ट उद्देश्य, अटूट श्रद्धा और निरंतर साधना हो, तो वह केवल अपना जीवन ही नहीं बदलता, बल्कि हजारों लोगों के जीवन में भी प्रकाश भर सकता है।
आचार्य शिव का जन्म केवल जीवन बिताने के लिए नहीं हुआ था। बचपन से ही उनके भीतर एक गहरी जिज्ञासा थी—मनुष्य क्यों जन्म लेता है, जीवन का उद्देश्य क्या है, और ऐसा कौन-सा मार्ग है जिससे मनुष्य दुख, भय और असंतोष से मुक्त होकर आनंदपूर्ण जीवन जी सके। यही प्रश्न उनके जीवन की दिशा बन गए। जब अधिकांश लोग बाहरी उपलब्धियों की खोज में व्यस्त थे, तब शिव अपने भीतर के सत्य की खोज में लगे हुए थे।
उनकी जीवनयात्रा का मूल आधार योग रहा है। योग उनके लिए केवल शरीर को स्वस्थ रखने की विधि नहीं, बल्कि जीवन को समझने की एक संपूर्ण विज्ञान-सम्मत और शास्त्रोक्त प्रक्रिया है। उन्होंने योग को केवल सीखा नहीं, बल्कि जिया। उन्होंने अपने प्रत्येक दिन को योगमय बनाया। उनके लिए जागना, चलना, बोलना, भोजन करना, सेवा करना, अध्ययन करना और ध्यान करना—सब कुछ योग का ही विस्तार है।
आचार्य शिव चाहते हैं कि लोग उन्हें तीन बातों के लिए याद रखें। पहली, एक ऐसे योगिक जीवन के लिए जो पूर्णतः शास्त्रोक्त, यथार्थ और अनुशासित हो। दूसरी, ऐसे गुरु और मार्गदर्शक के रूप में जो अपने शिष्यों को योग साधना में संपूर्ण और प्रामाणिक दिशा प्रदान करे। और तीसरी, ऐसे समाजसेवी के रूप में जिसने योग के माध्यम से निर्मल, निरामय और प्रेमपूर्ण समाज निर्माण का प्रयास किया।
उनके जीवन के मूल मूल्य अत्यंत स्पष्ट हैं। सत्य, अहिंसा, करुणा, मैत्री और यथार्थता उनके व्यक्तित्व की नींव हैं। वे मानते हैं कि किसी भी समाज का वास्तविक उत्थान तभी संभव है जब मनुष्य के भीतर करुणा और सत्य का विकास हो। उनके लिए धन भी केवल व्यक्तिगत सुख का साधन नहीं है। वे आर्थिक समृद्धि को एक शक्ति मानते हैं, जिसके माध्यम से अधिक व्यापक स्तर पर सेवा और मानव कल्याण किया जा सकता है। इसी कारण वे आर्थिक रूप से भी समृद्ध होना चाहते हैं, ताकि मानवता के लिए बड़े स्तर पर कार्य कर सकें।
समय उनके जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण तत्व है। उन्होंने अपने जीवन में समय के मूल्य को गहराई से समझा है। उनके लिए समय केवल घड़ी की सुई नहीं, बल्कि जीवन की सबसे मूल्यवान पूंजी है। इसलिए समय का पालन उनके प्रमुख चरित्र गुणों में से एक है। वे जानते हैं कि जो व्यक्ति समय का सम्मान करता है, समय भी उसी का सम्मान करता है।
आचार्य शिव का सपना केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित नहीं है। वे समाज में गहरे परिवर्तन लाना चाहते हैं। उनका पहला उद्देश्य लोगों को जीवन का अर्थ समझाना है। वे चाहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति यह समझे कि वह क्यों जी रहा है, किसलिए जी रहा है और जीवन को सार्थक कैसे बनाया जा सकता है। वे मानव निर्मित भेदभावों से मुक्त समाज का निर्माण देखना चाहते हैं, जहाँ व्यक्ति को उसके बाहरी स्वरूप से नहीं, बल्कि उसकी मानवता से पहचाना जाए।
उनका दूसरा उद्देश्य योग के माध्यम से लोगों को शारीरिक और मानसिक पीड़ाओं से मुक्त करना है। उन्होंने अपने जीवन में हजारों लोगों को दुख, रोग और मानसिक तनाव से बाहर निकलते देखा है। यही अनुभव उन्हें और अधिक सेवा करने की प्रेरणा देता है। वे जानते हैं कि जब शरीर स्वस्थ और मन शांत होता है, तभी मनुष्य अपने जीवन की ऊँचाइयों को प्राप्त कर सकता है।
उनका तीसरा उद्देश्य प्रेम और आदर पर आधारित समाज का निर्माण करना है। वे ऐसा समाज चाहते हैं जहाँ लोग एक-दूसरे को प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि सहयोगी समझें। जहाँ संबंध स्वार्थ पर नहीं, बल्कि सम्मान और संवेदना पर आधारित हों।
आचार्य शिव की उपलब्धियाँ उनकी साधना की साक्षी हैं। बचपन से ही उन्होंने पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाया और आत्मसंयम का जीवन जिया। उन्होंने वर्षों तक लंबी यात्राएँ कीं, कठिन परिस्थितियों में भी अपने कार्य को जारी रखा। उन्होंने सौ से अधिक योग एवं नैसर्गिक चिकित्सा शिविरों का आयोजन किया। 2000 से 2014 तक उन्होंने निःशुल्क योग शिक्षा देकर हजारों लोगों के जीवन में परिवर्तन लाया। उनका सीखने का उत्साह आज भी उतना ही जीवित है जितना युवावस्था में था। और सबसे महत्वपूर्ण बात, उन्होंने हजारों लोगों को शारीरिक और मानसिक पीड़ा से बाहर निकलने में सहायता की।
उनके जीवन पर अनेक महान व्यक्तित्वों का प्रभाव रहा है। रमामणि मेमोरियल आयंगर योग संस्थान ने उन्हें अनुशासित और समर्पित योग साधना का महत्व सिखाया। वैद्य परशुराम यशवंत खड़ीवाले से उन्होंने निस्वार्थ सेवा का भाव सीखा। नारायण महाराज से ईश्वर के प्रति समर्पण, स्वामी कृष्णानंद सरस्वती से गुरुभक्ति, योगी कृष्णमाचार्य से अनुशासन, पंचाक्षरी हीरेमठ महाराज से श्रद्धा, साईंजी से संयम और दाऊजी निताई प्रभु से ज्ञान के प्रचार का महत्व सीखा। इन सभी प्रेरणास्रोतों ने उनके व्यक्तित्व को आकार दिया।
भविष्य के लिएआचार्य शिव का एक अत्यंत विराट स्वप्न है। वे पुणे क्षेत्र में लगभग एकड़ भूमि पर “योगिक निसर्ग” नामक एक विशाल योग एवं मानवता विद्यापीठ स्थापित करना चाहते हैं। यह केवल एक आश्रम या संस्थान नहीं होगा, बल्कि मानव विकास का एक जीवंत केंद्र होगा। वहाँ एक समय में 100 लोग रह सकेंगे, भोजन कर सकेंगे, उपचार प्राप्त कर सकेंगे और जीवन जीने की कला सीख सकेंगे। वहाँ योग, प्राकृतिक जीवन, सेवा, शिक्षा और मानवता का समन्वय होगा।
वे चाहते हैं कि वहाँ आने वाला प्रत्येक व्यक्ति यह समझकर लौटे कि जीवन केवल जीवित रहने का नाम नहीं है। जीवन का उद्देश्य स्वयं को जानना, दूसरों के लिए उपयोगी बनना और प्रकृति के साथ संतुलन में रहना है।
आचार्य शिव अपने परिवार को भी केवल भौतिक सुख नहीं देना चाहते। वे उन्हें जीवन के गहरे सत्य समझाना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि उनका परिवार प्रेम, करुणा, अहिंसा, कृतज्ञता और सेवा के मूल्यों पर आधारित जीवन जिए। वे चाहते हैं कि उनके परिवार का प्रत्येक सदस्य प्रकृति के प्रति संवेदनशील हो और योगयुक्त जीवनशैली अपनाए।
61 वर्ष की आयु में भी शिव स्वयं को जीवन की संध्या में नहीं, बल्कि एक नए अध्याय की शुरुआत में देखते हैं। उनका लक्ष्य 101 वर्ष तक स्वस्थ, सक्रिय और योगदानपूर्ण जीवन जीना है। उनके लिए दीर्घायु का अर्थ केवल अधिक वर्षों तक जीवित रहना नहीं, बल्कि प्रत्येक दिन को सार्थक बनाना है।
उनकी दैनिक आदतें उनके जीवनदर्शन को प्रतिबिंबित करती हैं। नित्य योग साधना, समय पर जागना और सोना, सात्त्विक आहार, मन में करुणा और शांति बनाए रखना, अहंकार से मुक्त रहने का प्रयास और प्रतिदिन समाधि साधना—ये सभी उनके जीवन की आधारशिलाएँ हैं।
संपत्ति निर्माण के प्रति भी उनका दृष्टिकोण संतुलित है। वे पूंजी बाजार, रियल एस्टेट और मूल्यवान धातुओं में संपत्ति निर्माण करना चाहते हैं। उनका लक्ष्य ……. करोड़ रुपये की संपत्ति अर्जित करना है, परंतु यह लक्ष्य केवल व्यक्तिगत वैभव के लिए नहीं है। वे इसे मानवता और समाज सेवा के बड़े कार्यों के लिए एक साधन के रूप में देखते हैं।
उनके जीवन के छह अटल नियम हैं—समय का सम्मान, योग साधना, दिए गए वचन का पालन, योग शिक्षा का प्रसार, अत्यधिक अपेक्षाओं से मुक्त रहना और हर परिस्थिति में आत्मविश्वास तथा संयम बनाए रखना। यही नियम उन्हें कठिन परिस्थितियों में भी स्थिर रखते हैं।
आनंद के क्षणों में भी आचार्य शिव का मन योग और सेवा में ही रम जाता है। उन्हें लोगों को योग सिखाना अच्छा लगता है। उन्हें लंबी यात्राएँ, प्रकृति के बीच समय बिताना, ध्यान और समाधि की साधना करना, मित्रों से मिलना, ज्ञानग्रंथ पढ़ना और रोगग्रस्त लोगों की सेवा करना प्रिय है।
वे आधुनिक तकनीक सीखना चाहते हैं, नए कौशल विकसित करना चाहते हैं और अपने संदेश को अधिक लोगों तक पहुँचाना चाहते हैं। वे जानते हैं कि आज के युग में केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं है; ज्ञान को सही माध्यमों से समाज तक पहुँचाना भी आवश्यक है।
शिव का जीवन यह दर्शाता है कि आध्यात्मिकता और समृद्धि एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। वे दोनों का संतुलन स्थापित करना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि योग और मानवता के संदेश को विश्वभर में फैलाया जाए। वे चाहते हैं कि लोग समझें कि वास्तविक सुख बाहर नहीं, भीतर है। वास्तविक समृद्धि केवल बैंक खाते में नहीं, बल्कि मन की शांति और सेवा की भावना में होती है।
उनकी सबसे बड़ी विरासत कोई भवन, संस्था या संपत्ति नहीं होगी। उनकी वास्तविक विरासत वे लोग होंगे जिनके जीवन को उन्होंने स्पर्श किया होगा। वे शिष्य होंगे जिन्हें उन्होंने योग का मार्ग दिखाया होगा। वे परिवार होंगे जिन्हें उन्होंने स्वास्थ्य और आशा दी होगी। वे बच्चे होंगे जिन्हें उन्होंने प्रकृति प्रेम सिखाया होगा। और वे समाज होंगे जिन्हें उन्होंने प्रेम, करुणा और संतोष का महत्व समझाया होगा।
जब भविष्य में कोई शिव की जीवनगाथा पढ़ेगा, तो उसे एक ऐसे व्यक्ति की कहानी दिखाई देगी जिसने अपने लिए नहीं, बल्कि मानवता के लिए जीवन जिया। जिसने योग को केवल अभ्यास नहीं, बल्कि जीवन का स्वरूप बनाया। जिसने सेवा को धर्म माना, करुणा को शक्ति माना और सत्य को अपना पथप्रदर्शक बनाया।
आचार्य शिव की योगयात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है। यह यात्रा प्रतिदिन आगे बढ़ रही है। प्रत्येक साधना, प्रत्येक सेवा, प्रत्येक मुस्कान और प्रत्येक प्रेरणा के साथ यह यात्रा और अधिक प्रकाशमान होती जा रही है। और संभवतः आने वाले वर्षों में यह यात्रा हजारों नहीं, लाखों लोगों के जीवन को दिशा देने वाली एक जीवंत ज्योति बन जाएगी।
यही आचार्य शिव की पहचान है। यही उनका संकल्प है। यही उनका धर्म है। और यही उनकी अमर विरासत होगी।
YOGI OAMSHRI ACHARYASHIV
- He attended his first Yoga Class at Bengaluru, in 1982.
- He has been practicing Pranayama and Meditation under the guidance of Swamiji Ramling Swami, since 1987.
- He has been practicing Yoga from The Greatest Guruji B. K. S. Iyengar, since 2001.
- He learned Ayurvedic Naturopathy under the guidance of The Great Guruji Dada Khadiwale and Vaidya Shri Parshuram Yashwant Khadiwale at Vaidya Khadiwale Vaidyakiya Sanshodan Sanstha Gurukul, Pune.
- He learned scriptures under the guidance of the Great Guruji Hari Bhakta Parayan Dr. Narayan Jadhav Maharaj at Alandi Devachi, Pune.
- He learned and Studied Pranayama and Meditation under the guidance of Swami Shri Guru Krishnananand Sarswati at Ramgiri Ashram Ambeshiv Thane Maharashtra In 2007.
- He got a golden chance to be with Mahatma Sant Mauni Baba and learn yogic practices from them.
- Even today, He is the student of Ramamani Iyengar Memorial Yoga Institute Pune, India.
Testimonials
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